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Jagannath Temple History : भगवान जगन्नाथ 144 साल तक पुरी मंदिर से क्यों रहे दूर? जानिए पाताली श्रीक्षेत्र की रहस्यमयी और ऐतिहासिक कहानी

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Last updated: July 19, 2026 10:00 AM
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Jagannath Temple History : भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा और पुरी धाम का इतिहास जितना गौरवशाली है, उतना ही रहस्यमयी भी। धार्मिक परंपराओं और ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, एक समय ऐसा भी आया था जब भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की पवित्र प्रतिमाओं को हमलावरों से बचाने के लिए करीब 144 वर्षों तक पुरी मंदिर से दूर गुप्त स्थान पर रखा गया था। आइए जानते हैं इस रोचक इतिहास के बारे में।

Contents
हमलावरों से बचाने के लिए पुरी से हटाई गई थीं प्रतिमाएंक्या है पाताली श्रीक्षेत्र का अर्थ?करीब 144 वर्षों तक यहीं रहीं प्रतिमाएंराजा ययाति केशरी से जुड़ी है वापसी की मान्यतारक्तबाहु के आक्रमण का भी मिलता है उल्लेखकिन ग्रंथों में मिलता है उल्लेख?आज भी आस्था का प्रमुख केंद्र है पाताली श्रीक्षेत्र

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हमलावरों से बचाने के लिए पुरी से हटाई गई थीं प्रतिमाएं

पारंपरिक अभिलेख मादला पंजी (Madala Panji) और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, जब पुरी के जगन्नाथ मंदिर पर हमले का खतरा मंडराया, तब मंदिर के सेवकों और पुजारियों ने भगवान जगन्नाथ की प्रतिमाओं को सुरक्षित रखने के लिए गुप्त रूप से पुरी से हटाकर पाताली श्रीक्षेत्र पहुंचा दिया।

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यह स्थान वर्तमान ओडिशा के सुबर्णपुर (सोनपुर) जिले की त्रिकूट पहाड़ियों के पास माना जाता है, जहां प्रतिमाओं को लंबे समय तक सुरक्षित रखा गया।

क्या है पाताली श्रीक्षेत्र का अर्थ?

‘पाताली’ शब्द का अर्थ होता है छिपा हुआ या भूमिगत। मान्यता है कि इसी कारण इस स्थान को पाताली श्रीक्षेत्र कहा गया। यहां भगवान की प्रतिमाओं को गुप्त रूप से सुरक्षित रखा गया और स्थानीय शासकों, पुजारियों तथा ग्रामीणों ने वर्षों तक इस रहस्य की रक्षा की।

करीब 144 वर्षों तक यहीं रहीं प्रतिमाएं

लोक परंपराओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की प्रतिमाएं लगभग 144 वर्षों तक पाताली श्रीक्षेत्र में रहीं। इस दौरान पुरी मंदिर में नियमित पूजा-अर्चना प्रभावित रही, जबकि प्रतिमाओं की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बनी रही।

जब हमलावरों का खतरा समाप्त हुआ, तब प्रतिमाओं को दोबारा पुरी लाया गया और मंदिर में पूजा-अर्चना तथा रथ यात्रा की परंपरा फिर से शुरू हुई।

राजा ययाति केशरी से जुड़ी है वापसी की मान्यता

धार्मिक मान्यता के अनुसार, संकट समाप्त होने के बाद राजा ययाति केशरी भगवान जगन्नाथ की प्रतिमाओं को पुनः पुरी लेकर आए। इसके बाद मंदिर में नियमित धार्मिक अनुष्ठान और विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा का आयोजन फिर से प्रारंभ हुआ।

रक्तबाहु के आक्रमण का भी मिलता है उल्लेख

कुछ इतिहासकारों और पारंपरिक ग्रंथों के अनुसार, आठवीं शताब्दी के आसपास रक्तबाहु नामक आक्रमणकारी के हमले के दौरान भी भगवान जगन्नाथ की प्रतिमाओं को सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया था। कुछ स्थानीय परंपराएं दावा करती हैं कि उस समय प्रतिमाओं को लगभग 45 वर्षों तक भूमिगत रखा गया था।

किन ग्रंथों में मिलता है उल्लेख?

भगवान जगन्नाथ के इस ऐतिहासिक प्रसंग का उल्लेख कई पारंपरिक स्रोतों और स्थानीय ग्रंथों में मिलता है, जिनमें प्रमुख हैं—

  • मादला पंजी
  • सोनपुर इतिहास
  • सोनपुर राजगृह चंद्रिका
  • स्वर्णपुर गुणदर्श
  • कालियाक पुराण
  • दशकुमार चरित
  • तत्कालीन सोनपुर राज्य के दरबारी अभिलेख

हालांकि, आधुनिक इतिहासकार इन विवरणों के समय, अवधि और घटनाओं को लेकर अलग-अलग मत रखते हैं। इसलिए 144 वर्षों तक प्रतिमाओं के छिपे रहने का विवरण मुख्यतः पारंपरिक और धार्मिक स्रोतों पर आधारित माना जाता है।

आज भी आस्था का प्रमुख केंद्र है पाताली श्रीक्षेत्र

वर्तमान समय में पाताली श्रीक्षेत्र श्रद्धालुओं और इतिहास प्रेमियों के लिए विशेष महत्व रखता है। इसे भगवान जगन्नाथ की विरासत, आस्था और सांस्कृतिक इतिहास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल माना जाता है।

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