High Court’ बिलासपुर। महासमुंद जिला जेल में हत्या के आरोप में बंद एक बंदी नीरज भोई की संदिग्ध मौत के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) को व्यक्तिगत रूप से शपथपत्र पेश करने के निर्देश दिए हैं। दोनों अधिकारियों को 31 अगस्त तक यह स्पष्ट करना होगा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के मामले में जेल में बंद आरोपी की किन परिस्थितियों में मौत हुई।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में 35 चोटों के निशान
मामले की गंभीरता उस समय और बढ़ गई, जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बंदी के शरीर पर 35 चोटों के निशान पाए जाने की बात सामने आई। इन चोटों को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। कोर्ट यह जानना चाहता है कि बंदी को ये चोटें कैसे लगीं और उसकी मौत किन परिस्थितियों में हुई।
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मामले की जांच में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट हो सकेगा कि चोटों और मौत के बीच क्या संबंध था। कोर्ट ने मामले से जुड़े अधिकारियों से जवाबदेही तय करने की दिशा में जानकारी मांगी है।
डिवीजन बेंच ने मांगा व्यक्तिगत शपथपत्र
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को व्यक्तिगत शपथपत्र प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए राज्य के शीर्ष अधिकारियों से स्पष्ट जवाब मांगा है।
शपथपत्र में बंदी की मौत से पहले की परिस्थितियों, जेल में उसकी स्थिति और घटना से जुड़े प्रशासनिक एवं पुलिस रिकॉर्ड के संबंध में जानकारी दिए जाने की उम्मीद है।
हिरासत में हिंसा पर कोर्ट ने जताई चिंता
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने हिरासत में हिंसा और मौत की घटनाओं को लेकर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि ऐसी घटनाएं कानून के शासन पर आघात हैं। खासकर हिरासत में मौजूद व्यक्ति पूरी तरह असहाय स्थिति में होता है और उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य के अधिकारियों की होती है।
अदालत की टिप्पणी से साफ है कि हिरासत में बंद व्यक्तियों की सुरक्षा को लेकर प्रशासन की जवाबदेही बेहद महत्वपूर्ण है।


