मेरठ/गाजियाबाद। पिछले 13 वर्षों से बिस्तर पर अचेत पड़े 32 वर्षीय हरीश राणा के दर्दनाक संघर्ष का अंत होने जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने हरीश के माता-पिता की याचिका पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी है। इस फैसले में मेरठ के लाला लाजपत राय (LLRM) मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञों की रिपोर्ट सबसे महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुई।
चार डॉक्टरों की टीम ने किया था परीक्षण
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित प्राइमरी मेडिकल बोर्ड में मेरठ मेडिकल कॉलेज के चार वरिष्ठ चिकित्सकों को शामिल किया गया था। इस टीम ने गाजियाबाद स्थित हरीश के आवास पर जाकर उनका गहन परीक्षण किया था। टीम में शामिल विशेषज्ञ थे:
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डॉ. सचिन गर्ग (न्यूरोलॉजिस्ट)
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डॉ. अखिल प्रकाश (न्यूरोसर्जन)
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डॉ. अंकित कुमार (एनेस्थिसियोलॉजिस्ट)
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डॉ. अमित श्रीवास्तव (प्लास्टिक सर्जन)
रिपोर्ट में कहा- ‘सुधार की उम्मीद शून्य’
मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया था कि हरीश क्वाड्रिप्लेजिया (100 प्रतिशत दिव्यांगता) और परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट (PVS) में हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि 13 साल के लंबे उपचार के बावजूद उनके स्वास्थ्य में सुधार की संभावना ‘शून्य’ है। इसी रिपोर्ट के आधार पर एम्स (AIIMS) के सेकेंडरी बोर्ड ने भी अपनी मुहर लगाई, जिसके बाद अदालत ने माना कि हरीश को कृत्रिम रूप से जीवित रखना उनके साथ क्रूरता है।
क्या था मामला?
साल 2013 में चंडीगढ़ में पढ़ाई के दौरान चौथी मंजिल से गिरने के कारण हरीश के सिर में गंभीर चोट आई थी। तब से वह कोमा जैसी स्थिति में थे। उनके माता-पिता ने ‘राइट टू डाई विद डिग्निटी’ (गरिमा के साथ मरने का अधिकार) के तहत कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।



