मैदान से क्लासरूम तक: साक्षरता की नई तस्वीर
बस्तर के सुदूर वनांचलों में बने परीक्षा केंद्रों पर सुबह से ही लंबी कतारें देखी गईं। जिला प्रशासन ने इस अभियान को युद्ध स्तर पर चलाया, जिसका नतीजा आंकड़ों में साफ नजर आया। सबसे चौंकाने वाली और सकारात्मक तस्वीर जेलों और पुनर्वास केंद्रों से आई, जहां समाज की मुख्यधारा से कटे लोगों ने भी साक्षर होने की इच्छा जताई।
- कुल परीक्षार्थी: 25,000+ (बुजुर्ग, युवा और विशेष वर्ग)
- विशेष भागीदारी: स्थानीय जेल के कैदी और आत्मसमर्पित पूर्व माओवादी।
- उद्देश्य: बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान (Foundational Literacy).
बुजुर्गों ने चश्मा लगाकर वर्णमाला के अक्षर उकेरे, तो वहीं युवाओं ने डिजिटल युग में खुद को अपडेट करने के लिए इस परीक्षा को एक मौके की तरह इस्तेमाल किया। प्रशासन ने सुदूर इलाकों के लिए मोबाइल परीक्षा वैन और विशेष वॉलंटियर्स की तैनाती की थी।
“मैंने कभी नहीं सोचा था कि 60 साल की उम्र में फिर से स्कूल जाऊंगा। आज जब मैंने अपना नाम लिखना सीखा, तो लगा जैसे मैंने कोई बड़ी जंग जीत ली है। अब मैं बैंक में अंगूठा नहीं, दस्तखत करूंगा।”
— एक बुजुर्ग परीक्षार्थी, बस्तर



