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साइंस, स्पोर्ट्स से लेकर टेक्सटाइल तक, जानें PM मोदी ने ‘मन की बात’ में क्या-क्या कहा?

Hum Vatan News
Last updated: July 27, 2025 12:19 PM
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Mann Ki Baat: पीएम मोदी आज ‘मन की बात’ के 124वें एपिसोड के जरिए लोगों से रूबरू हुए। पीएम मोदी इस मौके पर देश के सामने अपने विचार रखे। इस दौरान पीएम मोदी ने कहा, पिछले कुछ हफ्तों में खेल, विज्ञान या संस्कृति में ऐसा कुछ हुआ है, जिस पर हर भारतीय को गर्व है। हाल ही में शुभांशु शुक्ला की धरती पर वापसी की चर्चा हुई। पूरा देश गर्व से भर गया। अगस्त 2023 में जब चंद्रयान 3 की सफल लैंडिंग हुई, तब एक नया माहौल बना। विज्ञान को लेकर बच्चों में एक नई जिज्ञासा जगी। आपने इंस्पायर मानक अभियान का नाम सुना होगा। इसमें हर स्कूल से पांच बच्चे चुने जाते हैं। हर बच्चा एक नया idea लेकर आता है। इससे लाखों बच्चे जुड़ चुके हैं। चंद्रयान 3 की लांचिंग के बाद इसकी संख्या दोगुनी हो गई है। अगले महीने 23 अगस्त को नेशनल स्पेस डे है। इसे मनाने के नए आइडिया मुझे जरूर भेजिएगा।

Contents
यूनेस्कों ने 12 किलों को दी वर्ल्ड हेरिटेज साइट की मान्यताफांसी के समय खुदीराम बोस के चेहरे पर थी मुस्कानतेजी से बढ़ रहा है टेक्सटाइल उद्योगपांडुलिपियों को किया जाएगा डिजिटाइज40 से ज्यादा पक्षियों की हुई पहचानगुमला में हुई नई शुरुआत71 देशों में भारत टॉप-3स्वच्छ भारत मिशन है असली जनभागीदारी

21वीं सदी के भारत में आज साइंस एक नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ रही है। कुछ दिन पहले हमारे छात्रों ने इंटरनेशनल केमेस्ट्री ओलंपियाड में मेडल जीते हैं। देवेश पंकज, संदीप कुची, देबदत्त प्रियदर्शी और उज्ज्वल केसरी, इन चारों ने भारत का नाम रोशन किया। मैथ्स की दुनिया में भी भारत ने अपनी पहचान को और मजबूत किया है। ऑस्ट्रेलिया में हुए इंटरनेशल मैथेमेटिक्स ओलंपियाड में हमारे छात्रों ने 3 गोल्ड, 2 सिल्वर और 1 ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया है। भारत अब ओलंपिक और ओलंपियाड में आगे बढ़ रहा है।

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यूनेस्कों ने 12 किलों को दी वर्ल्ड हेरिटेज साइट की मान्यता

यूनेस्को ने 12 किलों को वर्ल्ड हेरिटेज साइट की मान्यता दी है। ये सभी किले ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़े हैं। देश के और हिस्सों में भी ऐसे ही अद्भुत किले हैं, जिन्होंने आक्रमण झेले, खराब मौसम की मार झेली, लेकिन आत्मसम्मान को कभी भी झुकने नहीं दिया। राजस्थान का चित्तौड़गढ़ का किला, कुंभलगढ़ किला, रणथंभौर किला, आमेर किला, जैसलमेर का किला तो विश्व प्रसिद्ध है। कर्नाटका में गुलबर्गा का किला भी बहुत बड़ा है। चित्रदुर्ग के किले की विशालता भी आपको कौतूहल से भर देगी कि उस जमाने में ये किला बना कैसे होगा! उत्तर प्रदेश के बांदा में है, कालिंजर किला। महमूद गजनवी ने कई बार इस किले पर हमला किया और हर बार असफल रहा। बुन्देलखंड में ऐसे कई किले हैं, ग्वालियर, झांसी, दतिया, अजयगढ़, गढ़कुंडार, चंदेरी। ये किले सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं हैं, बल्कि हमारी संस्कृति के प्रतीक हैं। मैं सभी देशवासियों से आग्रह करता हूं कि इन किलों की यात्रा करें, अपने इतिहास को जानें।

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फांसी के समय खुदीराम बोस के चेहरे पर थी मुस्कान

आप कल्पना कीजिए, बिल्कुल भोर का वक्त, बिहार का मुजफ्फरपुर शहर, तारीख है, 11 अगस्त 1908 हर गली, हर चौराहा, हर हलचल उस समय जैसे थमी हुई थी। लोगों की आंखों में आंंसू थे, लेकिन दिलों में ज्वाला थी। लोगों ने जेल को घेर रखा था, जहां एक 18 साल का युवक, अंग्रेजों के खिलाफ अपना देश-प्रेम व्यक्त करने की कीमत चुका रहा था। जेल के अंदर, अंग्रेज अफसर, एक युवा को फांसी देने की तैयारी कर रहे थे। उस युवा के चेहरे पर भय नहीं था, बल्कि गर्व से भरा हुआ था। वो गर्व, जो देश के लिए मर-मिटने वालों को होता है। वो वीर, वो साहसी युवा थे, खुदीराम बोस। सिर्फ 18 साल की उम्र में उन्होंने वो साहस दिखाया, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। तब अखबारों ने भी लिखा था, “खुदीराम बोस जब फांसी के फंदे की ओर बढ़े, तो उनके चेहरे पर मुस्कान थी”। ऐसे ही अनगिनत बलिदानों के बाद, सदियों की तपस्या के बाद, हमें आजादी मिली थी। देश के दीवानों ने अपने रक्त से आजादी के आंदोलन को सींचा था।

तेजी से बढ़ रहा है टेक्सटाइल उद्योग

अगस्त का महीना तो क्रांति का महीना है। एक अगस्त को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि होती है। 8 अगस्त को गांधी जी के नेतृत्व में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की शुरुआत हुई थी। फिर आता है 15 अगस्त, हमारा स्वतंत्रता दिवस, हम अपने स्वतंत्रता सेनानियों को याद करते हैं, उनसे प्रेरणा पाते हैं। 7 अगस्त, 1905 को एक और क्रांति की शुरुआत हुई थी। स्वदेशी आंदोलन ने स्थानीय उत्पादों और खासकर हैंडलूम को एक नई ऊर्जा दी थी। इसी स्मृति में देश हर साल 7 अगस्त को ‘नेशनल हैंडलूम डे’ मनाता है। इस साल 7 अगस्त को ‘नेशनल हैंडलूम डे’ के 10 साल पूरे हो रहे हैं। जब देश विकसित भारत बनने की ओर कदम बढ़ा रहा है तो टेक्सटाइल सेक्टर ने बहुत योगदान दिया है। इन 10 सालों में इस सेक्टर ने नई-नई गाथाएं लिखीं। टेक्सटाइल भारत का सिर्फ एक सेक्टर नहीं है। ये हमारी सांस्कृतिक विविधता की मिसाल है। आज टेक्सटाइल और कपड़ा मार्केट बहुत तेजी से बढ़ रहा है, और इस विकास की सबसे सुंदर बात यह है की गांवों की महिलाएं, शहरों के डिजाइनर, बुजुर्ग बुनकर और स्टार्ट-अप शुरू करने वाले हमारे युवा सब मिलकर इसे आगे बढ़ा रहे हैं। आज भारत में 3000 से ज्यादा टेक्सटाइल कंपनियां सक्रिय हैं। 2047 के विकसित भारत का रास्ता आत्मनिर्भरता से होकर गुजरता है। ये वोकल फॉर लोकल से ही पूरा होगा। जिस चीज को भारतीय ने बनाया हो, उसी को खरीदें।

पांडुलिपियों को किया जाएगा डिजिटाइज

हमारी असली ताकत वो ज्ञान है, जिसे सदियों से पांडुलिपियां, Manuscripts के रूप में सहेजा गया है। इन पांडुलिपियों में विज्ञान है, चिकित्सा की पद्धतियां हैं, संगीत है, दर्शन है, और सबसे बड़ी बात वो सोच है, जो मानवता के भविष्य को उज्ज्वल बना सकती हैं। हमारे देश में हर कालखंड में कुछ ऐसे लोग हुए हैं, जिन्होंने इसे अपनी साधना बना लिया। ऐसे ही एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व हैं, मणि मारन जी, जो तमिलनाडु के तंजावुर से हैं। उन्हें लगा कि अगर आज की पीढ़ी तमिल पांडुलिपियां पढ़ना नहीं सीखेगी, तो आने वाले समय में ये अनमोल धरोहर खो जाएगी। उन्होंने शाम को कक्षाएं शुरू कीं। जहां छात्र, नौकरीपेशा युवा, Researcher, सब यहां आकर के सीखने लगे। मणि मारण जी ने लोगों को सिखाया कि “Tamil Suvadiyiyal” यानी Palm Leaf Manuscripts को पढ़ने और समझने की विधि क्या होती है। आज अनेकों प्रयासों से कई छात्र इस विधा में पारंगत हो। भारत सरकार ने इस वर्ष के बजट में एक ऐतिहासिक पहल की घोषणा की है ‘ज्ञान भारतम् मिशन’। इस मिशन के तहत प्राचीन पांडुलिपियों को Digitize किया जाएगा। फिर एक National Digital Repository बनाई जाएगी, जहां दुनिया भर के विद्यार्थी, शोधकर्ता, भारत की ज्ञान परंपरा से जुड़ सकेंगे।

40 से ज्यादा पक्षियों की हुई पहचान

हाल ही में एक शानदार प्रयास हुआ है। वैसे तो ये इलाका अपने Rhinos, गैंडों के लिए मशहूर है, लेकिन इस बार चर्चा का विषय बना है, यहां के घास के मैदान और उनमें रहने वाली चिड़िया। यहां पहली बार Grassland Bird Census हुआ है। आप जानकर खुश होंगे इस Census की वजह से पक्षियों की 40 से ज्यादा प्रजातियों की पहचान हुई है। इनका सेंसेस हुआ है। इसके लिए आवाज रिकॉर्ड करने वाले सेंसर लगाए। इसके बाद उनकी पहचान की गई। बिना उन्हें परेशान किए इन सभी पक्षियों की पहचान की गई। हमें ऐसे प्रयासों को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि हम अपनी जैव विविधता को पहचान सकें।

गुमला में हुई नई शुरुआत

झारखंड के गुमला जिले में एक समय था जब ये इलाका माओवादी हिंसा के लिए जाना जाता था। गांव विरान हो रहे थे, डर के साये में लोग जीते थे। जमीनें खाली पड़ी थीं और नौजवान पलायन कर रहे थे। बदलाव की शांत और धैर्य से शुरुआत हुआ। ओमप्रकाश साहू ने यहां हिंसा का रास्ता छोड़ा और मछलीपालन का काम शुरू किया। इस बदलाव का असर भी देखने को मिला। अब बंदूक पकड़ने वालों के हाथों में मछलियां पकड़ने वाले औजार हैं। सरकार के सहयोग से गुमला में मत्स्य क्रांति का आगाज हो गया है। गुमला की यह यात्रा हमें सिखाती है कि अगर रास्ता सही हो और मन में भरोसा हो तो कठिन परिस्थितियों में भी विकास का दीप जल सकता है।

71 देशों में भारत टॉप-3

ओलंपिक के बाद वर्ल्ड पुलिस और फायर गेम्स सबसे बड़ा स्पोर्ट इवेंट है। दुनिया भर के पुलिसकर्मी, fire fighters, security से जुड़े लोग उनके बीच होने वाला sports tournament है ये। इस बार ये tournament अमेरिका में हुआ और इसमें भारत ने इतिहास रच दिया। भारत ने करीब-करीब 600 मेडल जीते। 71 देशों में हम top-three में पहुंचे। ये जानना भी दिलचस्प होगा कि 2029 में ये खेल भारत में होंगे। दुनिया भर से खिलाड़ी हमारे देश में आएंगे। हर उन्हें अपनी खेल संस्कति से परिचय कराएंगे। बीते दिनों मुझे कई young athletes और उनके parents के संदेश मिले हैं। इनमें ‘खेलो भारत नीति 2025’ की खूब सराहना की गई है। इस नीति का लक्ष्य साफ है, भारत को sporting super power बनाना।

स्वच्छ भारत मिशन है असली जनभागीदारी

कुछ लोगों को कभी-कभी कोई काम नामुमकिन सा लगता है। लगता है, क्या ये भी हो पाएगा? लेकिन, जब देश एक सोच पर एक साथ आ जाए, तो असंभव भी संभव हो जाता है। ‘स्वच्छ भारत मिशन’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। स्वच्छ भारत मिशन को जल्द 11 साल पूरे होंगे, लेकिन इसकी ताकत और जरूरत आज भी वैसी ही है। लोग इसे अपना फर्ज मानता हैं, यही असली जनभागीदारी है। इस साल देश के 4500 से ज्यादा शहर और कस्बे स्वच्छता सर्वेक्षण से जुड़े। स्वच्छता को लेकर हमारे शहर और कस्बे अपनी जरूरतों और माहौल के हिसाब से अलग-अलग तरीके से काम कर रहे हैं। पूरा देश इन तरीकों को अपना रहा है।

सावन की फुहारों के बीच देश फिर से त्योहारों से सजने जा रहा है। कई पर्व यहां हमारी भावनाओं से जुड़े हैं। ये हमें प्रकृति से जुड़ाव और संस्कृति से जुड़ाव के संकेत देते हैं।

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