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SC Guidelines on Rape Cases : रेप और अन्य यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई: अब फैसलों में नहीं होंगे ‘बेबस महिला’ और ‘पवित्रता’ जैसे शब्द

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Last updated: August 4, 2026 1:22 PM
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नई दिल्ली: SC Guidelines on Rape Cases रेप और अन्य यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई: नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने रेप और अन्य यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई को अधिक संवेदनशील और पीड़ित-केंद्रित बनाने के लिए नई गाइडलाइंस जारी की हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि न्यायिक कार्यवाही और फैसलों में ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए, जो पीड़ित की गरिमा को ठेस पहुंचाए या पितृसत्तात्मक सोच को बढ़ावा दे।

Contents
125 ट्रायल कोर्ट के फैसलों का किया गया विश्लेषणपीड़ित-केंद्रित न्याय पर जोरदेरी, चोट या विरोध न करने को सहमति न माना जाएट्रायल के दौरान जजों के लिए अहम निर्देशपितृसत्तात्मक सोच वाली भाषा से बचने की सलाहक्यों बनाई गई यह समिति?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘लज्जा भंग’, ‘बेबस महिला’, ‘पवित्रता खो दी’, ‘हवस का शिकार’ जैसे शब्दों से बचा जाए। इनके स्थान पर ‘पीड़ित (Victim)’, ‘सर्वाइवर (Survivor)’, ‘शिकायतकर्ता (Complainant)’, ‘शारीरिक स्वायत्तता (Bodily Autonomy)’ और ‘यौन हमला (Sexual Assault)’ जैसे तटस्थ एवं सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग किया जाए।

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125 ट्रायल कोर्ट के फैसलों का किया गया विश्लेषण

‘Judgments and Gender: Sensitivity and Compassion in Writing Judgments’ शीर्षक वाली यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने तैयार की है। रिपोर्ट देशभर की ट्रायल कोर्ट के 125 फैसलों के अध्ययन और विभिन्न राज्य न्यायिक अकादमियों के सहयोग से तैयार की गई।

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पीड़ित-केंद्रित न्याय पर जोर

रिपोर्ट में कहा गया है कि न्यायिक प्रक्रिया के दौरान जजों को पीड़ितों, गवाहों और अन्य संवेदनशील पक्षों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना चाहिए। अदालतों को ऐसे सवाल पूछने या टिप्पणियां करने से बचना चाहिए जो पीड़ित को दोषी ठहराने वाली मानसिकता को बढ़ावा दें।

समिति ने यह भी कहा कि किसी भी परिस्थिति में पीड़ित को आरोपी से बातचीत या समझौते के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।

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देरी, चोट या विरोध न करने को सहमति न माना जाए

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि यदि पीड़ित ने शिकायत दर्ज कराने में देरी की है, शरीर पर चोट के निशान नहीं हैं या उसने शारीरिक विरोध नहीं किया, तो इसे सहमति का प्रमाण नहीं माना जा सकता। हर व्यक्ति सदमे की स्थिति में अलग-अलग प्रतिक्रिया देता है और अदालतों को पूर्वाग्रह से बचना चाहिए।

ट्रायल के दौरान जजों के लिए अहम निर्देश

विशेषज्ञ समिति ने ट्रायल कोर्ट के जजों को निर्देश दिया है कि वे अपमानजनक या अनावश्यक जिरह पर रोक लगाएं। विशेष रूप से पीड़ित के यौन इतिहास, कपड़ों या व्यक्तिगत व्यवहार से जुड़े सवालों को अनुमति न दी जाए।

इसके अलावा अदालतों को यह भी सुनिश्चित करने की सलाह दी गई है कि:

  • पीड़ित को अदालत में सम्मानजनक माहौल मिले।
  • गवाही के दौरान गैर-जरूरी लोगों को कोर्ट रूम से बाहर रखा जाए।
  • पीड़ित के बैठने, पानी और अन्य मूलभूत सुविधाओं का ध्यान रखा जाए।
  • आवश्यकता होने पर इन-कैमरा ट्रायल, कानूनी सहायता और गवाह सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए।

पितृसत्तात्मक सोच वाली भाषा से बचने की सलाह

रिपोर्ट में कहा गया है कि सम्मान, शर्म, पवित्रता और शुद्धता जैसे शब्द महिलाओं की गरिमा को उनकी यौन पवित्रता से जोड़ते हैं, जो संविधान की समानता और गरिमा की भावना के अनुरूप नहीं है। इसलिए न्यायिक तर्क का केंद्र सहमति, गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता और संवैधानिक अधिकार होने चाहिए।

क्यों बनाई गई यह समिति?

यह विशेषज्ञ समिति सुप्रीम कोर्ट के 10 फरवरी 2026 के आदेश के बाद गठित की गई थी। यह आदेश उस समय आया था जब अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक विवादित फैसले का स्वतः संज्ञान लिया था। इसके बाद यौन अपराधों की सुनवाई में संवेदनशीलता बढ़ाने और न्यायिक भाषा को अधिक सम्मानजनक बनाने के उद्देश्य से विस्तृत दिशानिर्देश तैयार किए गए।

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