16 Somwar Vrat : : नई दिल्ली। हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले लोगों के बीच व्रतों का विशेष महत्व है। इन्हीं में से एक बेहद लोकप्रिय और फलदायी उपवास है ’16 सोमवार का व्रत’। आमतौर पर यह व्रत मनचाहा वर पाने, वैवाहिक जीवन में सुख-शांति और अपनी मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए रखा जाता है। इसे विवाहित महिलाएं और कुंवारी कन्याएं दोनों ही रख सकती हैं। लेकिन अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर इस कठिन व्रत को शुरू करने की सही उम्र क्या है?
‘स्कंद पुराण’ के वैष्णव खंड में इस व्रत को रखने के कुछ बेहद खास और स्पष्ट नियम बताए गए हैं। आइए जानते हैं कि किस उम्र की कन्याएं इस व्रत की शुरुआत कर सकती हैं और इसके लिए किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है।
कन्या के लिए क्या है सही उम्र?
धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रों के अनुसार, 12 वर्ष की उम्र से कन्याएं 16 सोमवार का व्रत रखना शुरू कर सकती हैं। हालांकि, इसके लिए एक अनिवार्य नियम यह है कि कन्या के पीरियड्स (मासिक धर्म) की शुरुआत हो चुकी हो। इसके बाद ही वे इस व्रत का संकल्प ले सकती हैं।
शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य पहली प्राथमिकता
यदि कोई कन्या 12 या 16 वर्ष की उम्र में इस व्रत को शुरू करने का विचार कर रही है, तो सबसे पहले उसे अपनी शारीरिक क्षमता को परखना चाहिए।
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शास्त्र कहते हैं कि ईश्वर कभी भी खुद को कष्ट पहुंचाकर या भूखा मारकर भक्ति करने की सलाह नहीं देते।
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जो कन्याएं अक्सर बीमार रहती हैं या शारीरिक रूप से कमजोर हैं, उन्हें यह व्रत रखने से बचना चाहिए।
आध्यात्मिक जुड़ाव और पक्का संकल्प
16 सोमवार का व्रत केवल एक शारीरिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण का मार्ग है। इसे शुरू करने से पहले कन्या को पूरे 16 सोमवार श्रद्धा के साथ व्रत रखने का सच्चा संकल्प (Sankalp) लेना होता है। जब तक मन में गहरा आध्यात्मिक जुड़ाव न हो, तब तक व्रत के कठिन नियमों का पालन करना मुश्किल हो जाता है। ध्यान रहे कि 16 सोमवार पूरे होने के बाद 17वें सोमवार पर व्रत का विधि-विधान से उद्यापन करना भी उतना ही जरूरी है।
सात्विकता और खान-पान का कड़ा नियम
धार्मिक कथाओं के अनुसार, स्वयं देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए इस व्रत को किया था। इसलिए इस दौरान पूरी तरह सात्विक जीवन जीना अनिवार्य माना गया है:
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व्रत के दौरान मन में किसी के प्रति द्वेष या गलत विचार नहीं आने चाहिए।
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खान-पान में पूरी शुद्धता बरती जाती है। इस उपवास में केवल दूध या दूध से बनी चीजों और फलाहार का सेवन करने का नियम है।


