महिला आरक्षण बिल : नई दिल्ली। देश की राजनीति में पिछले दो हफ्तों में आए बड़े बदलाव ने संसद के समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं। अब इन घटनाक्रमों का सीधा असर आगामी मानसून सत्र में देखने को मिल सकता है, जहां केंद्र की एनडीए सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन बिल को पास कराने की तैयारी में जुटी है।
पहले क्यों अटका था बिल?
गौरतलब है कि अप्रैल महीने में विपक्ष की एकजुटता के चलते यह महत्वपूर्ण बिल लोकसभा में महज 54 वोटों से पास नहीं हो सका था। लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं और सरकार पहले से कहीं ज्यादा मजबूत स्थिति में नजर आ रही है।
टीएमसी में बगावत से बदली तस्वीर
इस सियासी बदलाव की सबसे बड़ी वजह पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में आई बड़ी बगावत मानी जा रही है। पार्टी के 28 में से 20 सांसदों ने अलग होकर ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (एनसीपीआई) का गठन कर लिया है, जो अब भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए का समर्थन कर सकती है।
महाराष्ट्र में भी सियासी हलचल
बंगाल के साथ-साथ महाराष्ट्र की राजनीति में भी उथल-पुथल जारी है। उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना के 9 में से 6 सांसदों के एकनाथ शिंदे गुट के साथ जाने की संभावना जताई जा रही है। इससे भी एनडीए को सीधा फायदा मिलने की उम्मीद है।
लोकसभा का नया गणित समझिए
लोकसभा की कुल 543 सीटों में से फिलहाल 3 सीटें खाली हैं। ऐसे में दो-तिहाई बहुमत के लिए 360 सांसदों का समर्थन जरूरी है। मौजूदा स्थिति में एनडीए के पास करीब 318 सांसद हैं, जबकि विपक्ष के पास 184 और अन्य दलों के पास 38 सांसद हैं।
टीएमसी के 20 बागी और शिवसेना के 6 संभावित बागी सांसदों के समर्थन से एनडीए की कमी घटकर केवल 28 वोट रह जाती है।
डीएमके का रुख बना ‘गेम चेंजर’
राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी डीएमके ने कांग्रेस से दूरी बना ली है। अगर डीएमके के 22 सांसद एनडीए का समर्थन करते हैं, तो यह आंकड़ा 348 तक पहुंच सकता है और बहुमत के लिए सिर्फ 6 वोट की जरूरत रह जाएगी।
राज्यसभा में भी समीकरण बदलने की संभावना
राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत के लिए 164 सांसदों का समर्थन जरूरी है। फिलहाल एनडीए के पास 150 सदस्य हैं। डीएमके के संभावित समर्थन से यह आंकड़ा 158 तक पहुंच सकता है, जिससे सरकार बहुमत के बेहद करीब आ जाएगी।
यदि एनडीए संसद के दोनों सदनों में जरूरी समर्थन जुटाने में सफल रहती है, तो मानसून सत्र में न केवल परिसीमन और महिला आरक्षण बिल पास हो सकता है, बल्कि ‘एक देश, एक चुनाव’ जैसे बड़े राजनीतिक फैसलों का रास्ता भी साफ हो जाएगा।



