- बड़ा स्कोर: जस्टिस पार्थ प्रतिम साहू की बेंच ने विश्वविद्यालय प्रशासन को घेरा।
- डेडलाइन: यूनिवर्सिटी को 4 माह के भीतर कर्मचारियों के आवेदन पर अंतिम फैसला लेना होगा।
- मुख्य राहत: दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को नया अभ्यावेदन (Representation) पेश करने की मिली अनुमति।
Chhattisgarh High Court Order , बिलासपुर — छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने बस्तर विश्वविद्यालय के दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के पक्ष में एक बड़ा ‘विनिंग स्ट्रोक’ खेला है। लंबे समय से नियमितीकरण की राह देख रहे कर्मचारियों के लिए कोर्ट का यह आदेश किसी गेम-चेंजर से कम नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि कर्मचारियों की मांगों को अब और ज्यादा समय तक ‘होल्ड’ पर नहीं रखा जा सकता।
मैदान का हाल: जस्टिस पार्थ प्रतिम साहू का कड़ा फैसला
हाई कोर्ट की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई के बाद यूनिवर्सिटी प्रशासन की सुस्त चाल पर ब्रेक लगा दिया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को अपनी मांगों के समर्थन में नए सिरे से दस्तावेज पेश करने की छूट दी है।
- टाइम-बाउंड एक्शन: विश्वविद्यालय प्रशासन को निर्देश दिया गया है कि वे 120 दिनों के भीतर हर हाल में अपना निर्णय सुनाएं।
- प्लेयर्स का संघर्ष: बस्तर यूनिवर्सिटी के कर्मचारी सालों से कम वेतन और अस्थायी स्टेटस के साथ फील्ड पर डटे हुए हैं।
- कानूनी स्टैंड: जस्टिस साहू ने याचिकाकर्ताओं को नया अभ्यावेदन प्रस्तुत करने के लिए ‘ग्रीन सिग्नल’ दे दिया है।
इस आदेश के बाद बस्तर के शैक्षणिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। कर्मचारियों का मानना है कि कोर्ट ने प्रशासन को बैकफुट पर धकेल दिया है, जिससे अब नियमितीकरण की राह आसान होगी।
“यूनिवर्सिटी प्रशासन को याचिकाकर्ताओं द्वारा दिए गए नए अभ्यावेदन पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करना होगा। यह पूरी प्रक्रिया 4 महीने की समय सीमा के भीतर पूरी की जानी चाहिए।” — जस्टिस पार्थ प्रतिम साहू, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट



