कानूनी दांव-पेच और दलबदल कानून से बचाव
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह विलय पूरी तरह से कानूनी रणनीति के तहत किया गया है। संविधान की 10वीं अनुसूची (दलबदल कानून) के तहत यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई सांसद दूसरी पार्टी में विलय करते हैं, तो उनकी सदस्यता रद्द नहीं होती। टीएमसी के बागी गुट के पास दो-तिहाई से अधिक संख्या होने का दावा है, जिससे वे अयोग्यता के खतरे से खुद को सुरक्षित करना चाहते हैं। काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में इन सांसदों ने संसद में अलग बैठने की व्यवस्था की भी मांग की है।
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क्या है NCPI? त्रिपुरा से जुड़ा है इतिहास
जिस ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) में टीएमसी के बागी सांसदों ने विलय किया है, वह मुख्य रूप से त्रिपुरा की एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी है। 20 जनवरी, 2023 को गठित इस पार्टी का चुनाव चिह्न ‘पेन की निब’ है। पार्टी का पंजीकृत कार्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के बानीपुर क्षेत्र में है। दिलचस्प बात यह है कि 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में इस पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा था और इसे बहुत ही कम वोट मिले थे। आज तक इस पार्टी का कोई भी प्रतिनिधि किसी भी सदन में नहीं पहुंचा है।
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ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया और भविष्य की राह
टीएमसी नेतृत्व ने इस बगावत को रोकने के लिए संगठनात्मक स्तर पर बड़े बदलाव किए हैं। पार्टी ने बागी सांसदों काकोली घोष दस्तीदार, सुदीप बंद्योपाध्याय और शताब्दी रॉय को महत्वपूर्ण पदों से हटा दिया है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखकर टीएमसी को एक अखंड पार्टी बताया है और किसी भी बागी गुट को अलग मान्यता न देने का आग्रह किया है। राज्य की राजनीति में अब देखना यह होगा कि ‘असली टीएमसी’ के दावे पर अदालत का रुख क्या होता है और आम जनता इस सियासी उलटफेर को किस तरह लेती है।



