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28 की उम्र में हुई सजा, 72 के हुए तो आया हाईकोर्ट का फैसला; सुप्रीम कोर्ट बोला— न्याय व्यवस्था की यह स्थिति चिंताजनक

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Last updated: June 10, 2026 1:00 PM
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Sentenced at 28, High Court verdict arrived at 72; Supreme Court calls the state of the justice system concerning.
Sentenced at 28, High Court verdict arrived at 72; Supreme Court calls the state of the justice system concerning.
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28 की उम्र में हुई सजा, 72 के हुए तो आया हाईकोर्ट का फैसला— सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुकदमों के बढ़ते बोझ और मामलों के निपटारे में हो रही असाधारण देरी पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने हत्या के एक मामले में दोषी व्यक्ति की अपील पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लंबित रहने को न्यायिक व्यवस्था के लिए एक अत्यंत चिंताजनक और असाधारण स्थिति करार दिया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि न्याय मिलने में इतनी लंबी देरी कानून के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है।

Contents
कानपुर के विजय सिंह का मामला: जवानी से बुढ़ापे तक का सफरन्यायालय की टिप्पणी और नए उपायों की तलाश
Sentenced at 28, High Court verdict arrived at 72; Supreme Court calls the state of the justice system concerning.
Sentenced at 28, High Court verdict arrived at 72; Supreme Court calls the state of the justice system concerning.

कानपुर के विजय सिंह का मामला: जवानी से बुढ़ापे तक का सफर

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यह पूरा मामला कानपुर के रहने वाले विजय सिंह से जुड़ा है। नवंबर 1983 में जब विजय सिंह को अपने भाई की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, तब उनकी उम्र महज 28 वर्ष थी। दिसंबर 1985 में कानपुर की एक सत्र अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। विजय सिंह ने इस फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। हालांकि, उनकी यह अपील करीब 41 साल तक ठंडे बस्ते में पड़ी रही और हाईकोर्ट ने 9 फरवरी 2026 को एक 20 पन्नों के फैसले के जरिए उनकी अपील को खारिज कर दिया।

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इस लंबी कानूनी लड़ाई के दौरान विजय सिंह सिर्फ तीन महीने जेल में रहे और पिछले 43 साल से जमानत पर बाहर हैं। अपनी याचिका में उन्होंने दर्द बयां करते हुए कहा कि उन्होंने अपनी जवानी, अधेड़ उम्र और अब बुढ़ापा, सब कुछ एक गंभीर अपराध के साए में गुजार दिया। अब वह 72 वर्ष के हो चुके हैं। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एएस चंदुरकर की पीठ ने सोमवार को इस स्थिति पर गहरी नाराजगी जताई और मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी रहने तक विजय सिंह की जमानत बरकरार रखने का आदेश दिया।

न्यायालय की टिप्पणी और नए उपायों की तलाश

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सुनवाई के दौरान अदालत ने वरिष्ठ वकीलों से पूछा कि इस भारी बैकलॉग से निपटने के लिए क्या रास्ते निकाले जा सकते हैं। इस पर एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने सुझाव दिया कि तीन दशकों से अधिक समय से लंबित अभियोजन पक्ष की अपीलों को सीधे खारिज कर दिया जाए। हालांकि, पीठ ने इस विचार को तुरंत खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि मुकदमों के केवल पुराने होने के आधार पर उन्हें खारिज करना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ होगा। इससे सार्वजनिक हितों को नुकसान पहुंच सकता है और पक्षों को अपनी बात रखने के अधिकार से वंचित होना पड़ेगा।

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