सुप्रीम कोर्ट की ED को दो टूक: अदालती समय की बर्बादी पर जताई नाराजगी— छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित शराब घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) को सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार झेलनी पड़ी। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट से मिली जमानत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान, शीर्ष अदालत ने ईडी के बार-बार सुनवाई टालने के रवैये पर तीखी टिप्पणी की।

जस्टिस सूर्यकांत की सख्त टिप्पणी
मामले की सुनवाई प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ कर रही थी। सुनवाई के दौरान जैसे ही ईडी के वकील ने मामले को टालने (स्थगन) की मांग की, पीठ का धैर्य जवाब दे गया। कोर्ट ने इस पर असंतोष जाहिर करते हुए स्पष्ट कहा कि न्यायपालिका का समय अमूल्य है और एजेंसी को इसे गंभीरता से लेना चाहिए।
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अदालत ने कहा, “हम रातभर इन मामलों की फाइलें पढ़ते हैं ताकि सुनवाई के दौरान पूरी तैयारी रहे, और आप कोर्ट में आकर स्थगन (adjournment) मांग लेते हैं।” पीठ ने ईडी को नसीहत दी कि पहले मामले को सूचीबद्ध कराने की जल्दबाजी की जाती है और बाद में उसी तत्परता को सुनवाई के दौरान बनाए नहीं रखा जाता।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला छत्तीसगढ़ में 2,000 करोड़ रुपये से अधिक के कथित शराब घोटाले से जुड़ा है। ईडी ने चैतन्य बघेल पर अवैध तरीके से धन के हेरफेर और रियल एस्टेट निवेश का आरोप लगाया है। इस मामले में चैतन्य बघेल को हाई कोर्ट से जमानत मिल गई थी, जिसके खिलाफ ईडी ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की है।
निवासियों और कानून व्यवस्था पर असर
इस टिप्पणी ने दिल्ली के कानूनी गलियारों से लेकर रायपुर तक हलचल मचा दी है। स्थानीय निवासी और कानूनी विशेषज्ञ इसे सरकारी जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर एक बड़े सवाल के रूप में देख रहे हैं। यदि एजेंसियां अदालती कार्यवाही में तत्परता नहीं दिखाती हैं, तो इसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ता है जो अपनी जमानत या केस के निपटारे का महीनों से इंतजार कर रहे हैं। बार-बार स्थगन से न केवल अदालतों का बोझ बढ़ता है, बल्कि न्याय मिलने में भी अनावश्यक देरी होती है।



